युद्ध और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच पर्यावरण संरक्षण को नजरअंदाज करना क्यों खतरनाक?
मौजूदा दौर में भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक दबाव और युद्ध की स्थितियों के बीच यह सोचना बेहद आम हो गया है कि प्रकृति का संरक्षण कोई फौरी जरूरत नहीं है जिसे केवल शांति के समय ही पूरा किया जा सकता है। लेकिन यह मानसिकता दीर्घकाल में भारी नुकसान पहुंचा सकती है, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था और मानव जीवन की बुनियादी जरूरतें सीधे तौर पर पर्यावरण पर टिकी हुई हैं।

प्रकृति पर टिकी है वैश्विक अर्थव्यवस्था
दुनिया की आधी से अधिक जीडीपी और प्राकृतिक सेवाएं आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं। नौ ट्रिलियन डॉलर से अधिक का वैश्विक खाद्य बाजार उपजाऊ मिट्टी पर निर्भर है, जबकि करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी वनों से चलती है। इसके अलावा, नदियां और पारिस्थितिकी तंत्र बाढ़ के पानी को नियंत्रित कर परिवहन और जीवनचक्र को सुचारू बनाए रखते हैं। ऐसे में पर्यावरणीय सुरक्षा को किसी भी स्तर पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
युद्ध और चरम मौसम का दोहरा संकट
पर्यावरण और जलवायु से जुड़े प्रश्न तब तक इंतजार नहीं कर सकते जब तक कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में चल रहे संघर्ष थम न जाएं। जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे जैसी घटनाओं से फसलों को भारी नुकसान पहुंच रहा है, और दूसरी तरफ वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने से जरूरी उत्पादों की कीमतें आसमान छू रही हैं। चरम मौसमी घटनाओं और संघर्षों के मिले-जुले असर ने खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी वार्षिक क्षति उठानी पड़ सकती है।

’30 बाय 30′ लक्ष्य की वर्तमान स्थिति
इस दशक के अंत तक यानी 2030 तक दुनिया के कम से कम तीस प्रतिशत भूभाग और समुद्री क्षेत्रों की रक्षा करने का लक्ष्य बेहद अहम है। पिछले कुछ वर्षों में भूमि और आंतरिक जल क्षेत्रों के संरक्षण की दिशा में कुछ प्रगति जरूर हुई है, लेकिन महासागरों के संरक्षण की गति अभी भी काफी धीमी बनी हुई है। इस लक्ष्य को पूरी तरह से हासिल करने के लिए वित्तीय संसाधनों और प्रशासनिक प्रतिबद्धताओं में व्यापक सुधार की आवश्यकता है ताकि प्रकृति को सुरक्षित रखा जा सके।
