भारत में महिला श्रम बल भागीदारी और रोजगार के मोर्चे पर चुनौतियां
भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLPR) वर्तमान में 35 प्रतिशत है, जो कि बांग्लादेश और फिलीपींस जैसे देशों के मुकाबले काफी कम है। हालांकि यह आंकड़ा वर्ष 2017-18 के 21 प्रतिशत से जरूर बढ़ा है, लेकिन इस बढ़ोतरी में सत्तर प्रतिशत से अधिक योगदान कृषि और निर्वाह-आधारित क्षेत्रों का ही है।

श्रम बाजार में भागीदारी और सामाजिक बाधाएं
पारंपरिक रूप से महिलाओं की कम भागीदारी के पीछे सामाजिक नियमों, अवैतनिक देखभाल के काम (unpaid care work), आवागमन की पाबंदियों और कानूनी सुरक्षा की कमी जैसी आपूर्ति पक्ष की बाधाओं को जिम्मेदार माना जाता रहा है। यूएन वुमन की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय महिलाएं अपना काफी समय अवैतनिक देखभाल के कामों में बिताती हैं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं की शिक्षा के स्तर और राजनीतिक भागीदारी में सुधार देखा गया है, फिर भी गैर-कृषि रोजगारों में उनकी स्थिति में बड़ा बदलाव नहीं आया है.
अर्थव्यवस्था में श्रम की मांग की कमी
विशेषज्ञों का मानना है कि इस विरोधाभास के पीछे भारतीय अर्थव्यवस्था में कुल श्रम मांग की कमी भी एक अहम कारक है। अन्य समान अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत की श्रम तीव्रता (labor intensity) कम है। इसके अलावा, युवाओं, विशेषकर 15 से 25 वर्ष की आयु के स्नातकों में बेरोजगारी की दर अधिक होना भी इस बात का संकेत देता है कि पर्याप्त वेतन वाली नौकरियों की उपलब्धता सीमित है।

रोजगार सृजन और भविष्य की दिशा
कंपनियों के लिए श्रम कानूनों की जटिलताएं और कर्मचारियों को नियुक्त करने व हटाने से जुड़ी पाबंदियां भी रोजगार लागत को बढ़ाती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बढ़ाने के लिए तेज जीडीपी विकास के साथ-साथ ऐसे रोजगारोन्मुखी विकास मॉडल की आवश्यकता है जो श्रम की मांग को बढ़ावा दे सकें।
