उत्तराखंड के ग्लेशियरों पर नई वैज्ञानिक स्टडी, हर साल तेजी से पीछे खिसक रहे हैं हिमखंड
उत्तराखंड के मध्य हिमालयी क्षेत्र में स्थित ग्लेशियरों के तेजी से पीछे खिसकने का एक गंभीर मामला सामने आया है। हाल ही में हुए एक वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, राज्य के ग्लेशियर औसतन 23.23 मीटर प्रति वर्ष की दर से सिकुड़ रहे हैं।

खतलिंग ग्लेशियर में सबसे अधिक पिघलाव
शोधकर्ताओं के मुताबिक, टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित खतलिंग ग्लेशियर सबसे तेजी से प्रभावित हो रहा है, जो लगभग 88 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे खिसक रहा है। इस अध्ययन को यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज (UPES) देहरादून और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG) के वैज्ञानिकों ने मिलकर तैयार किया है। शोध के निष्कर्ष ‘डिस्कवर जियोसाइंस’ नामक जर्नल में प्रकाशित किए गए हैं।
अध्ययन के मुख्य बिंदु और आंकड़े
शोध टीम ने उपग्रह चित्रों, डिजिटल एलिवेशन मॉडल और दशकों के मैदानी सर्वेक्षण आंकड़ों का विश्लेषण किया। अध्ययन में प्रमुख ग्लेशियरों के आंकड़े सामने आए हैं:

- गंगोत्री ग्लेशियर: औसतन 22 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे खिसका है।
- पिंडारी ग्लेशियर: 45.8 मीटर प्रति वर्ष की दर से पिघलाव दर्ज किया गया।
- मिलम ग्लेशियर: इसकी पीछे खिसकने की दर 37.8 मीटर प्रति वर्ष रही है।
- सतोपथ और चोराबाड़ी ग्लेशियर: इनकी पिघलने की गति अपेक्षाकृत कम, क्रमशः लगभग 6.5 मीटर और 6.8 मीटर प्रति वर्ष पाई गई।
तापमान के अलावा अन्य कारक
वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल तापमान ही ग्लेशियरों के पिघलने का एकमात्र कारण नहीं है। ऊंचाई, ढलान, आकार, बर्फ की मोटाई और सतह पर मौजूद मलबा भी पिघलने की गति को तय करते हैं। ग्लेशियर की सतह पर जमा चट्टानी मलबा (सुप्रा-ग्लेशियल डिब्रिस) एक इन्सुलेटिंग परत के रूप में काम करता है, जो बर्फ को धूप से बचाता है। इसके विपरीत, झीलों के पास या झीलों में समाप्त होने वाले ग्लेशियर अधिक तेजी से पिघलते हैं।
झील-निर्माण और भावी चुनौतियां
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने से लगभग 47 नई हिमनद झीलें (ग्लेशियल लेक्स) बन गई हैं। पानी के संपर्क में आने वाली बर्फ तेजी से पिघलती है, जिससे भविष्य में झीलों का जलस्तर बढ़ने और बाढ़ जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि ग्लेशियरों की निगरानी को केवल वैज्ञानिक अध्ययन तक सीमित न रखकर आपदा प्रबंधन, पर्यटन और जल सुरक्षा योजनाओं के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
