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राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा और राजनीतिक चुनौतियां

राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा और राजनीतिक चुनौतियां

भारतीय जनता पार्टी के तीन प्रमुख वैचारिक मुद्दों में से समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को सबसे पेचीदा माना जाता है। धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों की विविधता के कारण इसे लागू करना एक जटिल प्रक्रिया रही है, इसके बावजूद सरकार ने इस दिशा में कदम उठाने का निर्णय लिया है।

राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा और राजनीतिक चुनौतियां

गृह मंत्री की घोषणा के बाद कि एनडीए शासित राज्य 2029 के चुनावों से पहले अपने यहां यूसीसी लागू करेंगे, राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाएं शुरू हो गई हैं। हालांकि विपक्षी दल इस पर चुप्पी साधे हुए हैं, लेकिन एनडीए के भीतर से ही कुछ असहमतियां और विचार-विमर्श की मांग सामने आई है। पूर्वोत्तर के सहयोगी दल और अन्य क्षेत्रीय पार्टियां भी पारंपरिक रीति-रिवाजों और जनजातीय प्रथाओं के प्रभाव को लेकर चिंता जता चुकी हैं।

संवैधानिक प्रावधान और राज्यों की भूमिका

संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों का हिस्सा होने के बावजूद विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे विषयों पर राष्ट्रीय कानून बनाने से पिछली सरकारें बचती रही हैं। चूंकि व्यक्तिगत नागरिक मामलों से जुड़े कानून समवर्ती सूची में आते हैं, इसलिए राज्यों को अपने नियम बनाने का अधिकार है। राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाने के बजाय राज्य-दर-राज्य यूसीसी अपनाने का रास्ता निकाला गया है, हालांकि जानकारों का मानना है कि अलग-अलग राज्यों में भिन्न संहिताएं होने से इसका मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।

राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा और राजनीतिक चुनौतियां

उत्तराखंड का अनुभव और अन्य राज्यों की स्थिति

उत्तराखंड देश का वह पहला राज्य बना जिसने इस तरह की संहिता तैयार की, लेकिन इसे लेकर कई कानूनी चुनौतियां भी सामने आईं। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर होने के कारण इसके क्रियान्वयन में जटिलताएं आई हैं, और आदिवासी समुदायों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। उत्तराखंड के इस मॉडल को आधार बनाकर गुजरात, मध्य प्रदेश और असम ने भी कानून पारित किए हैं, जिन्हें अभी राष्ट्रपति की स्वीकृति का इंतजार है।