सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा और बदलते रणनीतिक खतरे
भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर से जोड़ने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ को लेकर सुरक्षा की परिभाषा समय के साथ बदल रही है। हाइब्रिड संघर्षों के इस दौर में किसी भी विरोधी के लिए इस कॉरिडोर पर सीधे कब्जा करना जरूरी नहीं रह गया है, बल्कि केवल रणनीतिक व्यवधान पैदा करना ही बड़ा असर डाल सकता है। इस बेहद संकरे क्षेत्र के आसपास नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और सिक्किम की भौगोलिक स्थिति इसे बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील बनाती है।

बदलते सुरक्षा खतरे और हाइब्रिड संघर्ष
पारंपरिक सैन्य आक्रामकता की तुलना में आज की सबसे बड़ी चुनौती खतरों के बढ़ते दायरे से जुड़ी है। किसी बड़े संघर्ष के दौरान परिवहन लाइनों का बाधित होना, दूरसंचार सेवाओं में रुकावट, महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर ड्रोन के जरिए हमले या सुनियोजित तोड़फोड़ जैसे कदम तात्कालिक नुकसान से कहीं अधिक गंभीर परिणाम दे सकते हैं। इसके अलावा, साइबर हमले और गलत सूचनाएं फैलाकर लोगों में भ्रम पैदा करना भी इन रणनीतिक चुनौतियों का हिस्सा बन चुका है।
भौगोलिक स्थिति और स्थानीय समन्वय का महत्व
बिहार के किशनगंज, अररिया और पूर्णिया जैसे जिले इस कॉरिडोर से सटे हुए हैं, जिससे इस रणनीतिक गहराई का विस्तार बिहार तक होता है। नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी जैसे अवैध नेटवर्क सामान्य दिनों में कानून-व्यवस्था की समस्या लग सकते हैं, लेकिन संकट के समय इनका इस्तेमाल शत्रुतापूर्ण तत्वों द्वारा किया जा सकता है। इसलिए स्थानीय पुलिस व्यवस्था, खुफिया एजेंसियों के बीच मजबूत तालमेल और पुख्ता निगरानी इस क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बेहद आवश्यक हैं।

रणनीतिक गहराई और सुरक्षा के नए आयाम
सीमाओं पर कड़ी नजर रखने का अर्थ केवल अवैध रूप से सीमा पार करने वालों को रोकना नहीं है, बल्कि वैध और अवैध आवाजाही के बीच के अंतर को समझना भी है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर को सुरक्षित रखने का मुख्य उद्देश्य पूर्वोत्तर को देश के बाकी हिस्सों से निर्बाध रूप से जोड़े रखना है। इस भूगोल को किसी भी प्रकार की कमजोरी बनने से रोकने के लिए बहुस्तरीय सुरक्षा उपायों और पैनी नजर की आवश्यकता है।
