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आत्ममूल्यांकन के बिना प्रशंसा को न अपनाएं, जानिए क्या कहते हैं विचार

आत्ममूल्यांकन के बिना प्रशंसा को न अपनाएं, जानिए क्या कहते हैं विचार

जीवन में जब कभी हमारी लोकप्रियता बढ़ती है और लोग सराहना करते हैं, तो अक्सर प्रशंसा के शब्द काफी बड़े हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में बिना सोचे-समझे तारीफ को स्वीकार करने से व्यक्ति के भीतर अहंकार जन्म ले सकता है, जो बाद में दुर्गुण का रूप धारण कर लेता है। इसलिए यह आवश्यक है कि जब भी सराहना या तारीफ मिले, उसे तुरंत भीतर न उतारें।

आत्ममूल्यांकन के बिना प्रशंसा को न अपनाएं, जानिए क्या कहते हैं विचार

प्रशंसा पर लगाएं आत्ममूल्यांकन का टोल टैक्स

विशेषज्ञों के अनुसार, जिस प्रकार सड़क पर चलने के लिए टोल टैक्स चुकाना पड़ता है, उसी तरह जीवन में आने वाली प्रशंसा पर भी ‘स्व-मूल्यांकन’ का टोल टैक्स लगाना चाहिए। जब कोई आपकी तारीफ करे, तो उसे रोककर पहले अपना मूल्यांकन करना चाहिए। यह इस बात को समझने का जरिया है कि क्या वास्तव में वह सराहना हमारे गुणों के अनुकूल है या नहीं।

ऐतिहासिक प्रसंग और सीख

इस बात को समझने के लिए रामचरितमानस के अयोध्याकांड का एक प्रसंग काफी महत्वपूर्ण है। जब भरी सभा में राजा दशरथ की प्रशंसा हो रही थी, तब उन्होंने दर्पण देखा था। आमतौर पर सार्वजनिक रूप से दर्पण देखने का चलन नहीं होता, लेकिन उन्होंने ऐसा करके अपना मूल्यांकन किया था। उनका यह प्रयास हमें यह सिखाता है कि जब भी समाज में जय-जयकार हो, हमें अपनी असलियत का आंकलन जरूर करना चाहिए।

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निष्कर्ष

तारीफ और लोकप्रियता क्षणिक हो सकती हैं, लेकिन उनसे उत्पन्न होने वाला अहंकार व्यक्ति के व्यक्तित्व को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए आत्ममूल्यांकन को अपनी आदत का हिस्सा बनाना चाहिए ताकि प्रशंसा हमें सकारात्मक दिशा दे सके, न कि भ्रमित करे।