क्षेत्रीय दलों के संकट का कारण जनाधार की कमी नहीं बल्कि अंदरूनी कलह
हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति पर नजर डालें तो यह स्पष्ट होता है कि कई स्थापित क्षेत्रीय दल सत्ता से बाहर होने के साथ-साथ अपने अस्तित्व को बचाने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। हालांकि, इन राजनीतिक दलों के पतन का प्रमुख कारण उनका जनाधार खोना नहीं है, बल्कि पारिवारिक विवाद और पार्टी प्रमुख के कमजोर होने पर नेतृत्व के बदलाव को सही ढंग से न संभाल पाना है। आंकड़ों के अनुसार, इन दलों को आज भी चुनावों में जनता का अच्छा-खासा वोट प्रतिशत मिलता रहा है, जो उनके मजबूत जनसमर्थन की गवाही देता है।

वोटरों का भरोसा कायम, लेकिन अंदरूनी संघर्ष भारी
लोकसभा चुनावों के आंकड़ों पर गौर करें तो क्षेत्रीय दलों को मिलने वाले वोटों में निरंतरता बनी हुई है। वर्ष 2009 के आम चुनाव में इन पार्टियों को कुल 31.2 प्रतिशत वोट मिले थे, जो 2014 में बढ़कर 35.8 प्रतिशत हो गए। इसके बाद 2019 में यह आंकड़ा 28.1 प्रतिशत और 2024 में 33.5 प्रतिशत दर्ज किया गया। हाल के विधानसभा चुनावों में भी कई राज्यों में हारने के बावजूद इन दलों को भारी जनसमर्थन हासिल हुआ है, जो यह साबित करता है कि मतदाता इन पर भरोसा करते हैं।
पारिवारिक कारोबार की तरह संचालन और उत्तराधिकार की जंग
भारत में क्षेत्रीय दलों की एक बड़ी कमजोरी यह रही है कि उनका संचालन अक्सर एक पारिवारिक व्यवसाय की तरह किया जाता है। जब परिवार के भीतर मतभेद उभरते हैं, तो पार्टी का ढांचा भी चरमरा जाता है। देश के विभिन्न राज्यों में इसके कई उदाहरण देखने को मिले हैं, जहां अकाली दल, शिवसेना, समाजवादी पार्टी, और लोक जनशक्ति पार्टी जैसे दल पारिवारिक कलह और विभाजन का शिकार हुए। इसके अलावा, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी इसी तरह के अंदरूनी टकराव और नेतृत्व को लेकर असंतोष की स्थिति सामने आई है।

नेतृत्व चुनने की स्पष्ट व्यवस्था का अभाव
इन राजनीतिक दलों में उत्तराधिकारी या शीर्ष नेता चुनने के लिए शायद ही कोई पारदर्शी और स्पष्ट प्रणाली मौजूद होती है। आमतौर पर परिवार के किसी सदस्य को ही सर्वोच्च पद सौंप दिया जाता है। जब पार्टी का संस्थापक कमजोर होता है या उसका निधन हो जाता है, तो परिवार के अन्य सदस्यों में सत्ता की होड़ लग जाती है। ऐसी पार्टियों में वफादारी संगठन के बजाय किसी एक व्यक्ति विशेष के प्रति होती है, जिसके कारण परिवार के बंटते ही कार्यकर्ता भी विभाजित हो जाते हैं और मतदाताओं का भरोसा भी डगमगाने लगता है।
