मुंबई ट्रेन हादसे में बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, मृतक के परिजनों को मिलेगा मुआवजा
बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई की लोकल ट्रेन से गिरकर जान गंवाने वाले एक युवा श्रमिक के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए रेलवे को उसके माता-पिता को आठ लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केवल यात्रा का टिकट न मिलने के आधार पर किसी व्यक्ति के वैध यात्री होने के दर्जे को नकारा नहीं जा सकता है। यह मामला एक दशक पहले हुए हादसे से जुड़ा हुआ है।

हादसे की पूरी पृष्ठभूमि
घटना एक सितंबर 2015 की है, जब 19 वर्षीय संदीप पांडा नवी मुंबई के बेलापुर से मुंबई के सीएसएमटी की ओर यात्रा कर रहे थे। अत्यधिक भीड़ के कारण वे ट्रेन के दरवाजे के पास खड़े थे और कुर्ला तथा चूनाभट्टी स्टेशनों के बीच अचानक नीचे गिर गए। सायन अस्पताल ले जाने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनके माता-पिता ने रेलवे से मुआवजे की मांग की थी, लेकिन ट्रिब्यूनल ने यह दावा खारिज कर दिया था कि क्योंकि शव के पास से दूसरी यात्रा का टिकट मिला था, इसलिए उन्हें वैध यात्री नहीं माना जा सकता।
अदालत की सख्त टिप्पणी
पीड़ित परिवार ने ट्रिब्यूनल के इस निर्णय को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान रेलवे ने तर्क दिया कि वापसी की यात्रा का टिकट नहीं मिलने के कारण दावा खारिज करने का अधिकार है। हालांकि, जस्टिस साठे ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि नियम न्याय प्रदान करने के लिए होने चाहिए, न कि न्याय से वंचित करने का बहाना बनने के लिए।

संस्थागत संवेदनशीलता की जरूरत
अदालत ने जांच प्रक्रिया की कमियों पर भी सवाल उठाए और रेलवे एक्ट की व्याख्या को संकीर्ण बताया। इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि किसी अपने को खोने वाले सामान्य परिवारों को कानूनी लड़ाई में किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासनिक स्तर पर और अधिक करुणा तथा संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है, ताकि पीड़ित परिवारों की परेशानियां और अधिक न बढ़ें।
