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प्रशांत महासागर में अल नीनो ने तोड़े तापमान के सभी पुराने रिकॉर्ड, मौसम पर मंडराया संकट

प्रशांत महासागर में अल नीनो ने तोड़े तापमान के सभी पुराने रिकॉर्ड, मौसम पर मंडराया संकट

प्रशांत महासागर में सक्रिय अल नीनो ने तापमान के मामले में नया और ऐतिहासिक रिकॉर्ड कायम कर दिया है, जिसके चलते वैश्विक जलवायु चक्र और भारत के मानसून पर गंभीर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) के अनुसार, मध्य भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र की सतह का तापमान बढ़कर लगभग 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। वैज्ञानिकों द्वारा अल नीनो की निगरानी के लिए इस क्षेत्र को सबसे मुख्य माना जाता है और उपलब्ध रिकॉर्ड्स में इस स्तर की गर्मी पहली बार दर्ज की गई है।

प्रशांत महासागर में अल नीनो ने तोड़े तापमान के सभी पुराने रिकॉर्ड, मौसम पर मंडराया संकट

अल नीनो के रिकॉर्ड तोड़ने की मुख्य वजह

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है जिसमें मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म होने लगता है। इस अत्यधिक गर्माहट का सीधा असर हवाओं और मानसूनी बादलों की गति पर पड़ता है, जिससे समुद्र से हजारों किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्रों का मौसम भी प्रभावित होता है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के मुताबिक, इस बार का अल नीनो बेहद शक्तिशाली है। नीनो 3.4 कहे जाने वाले प्रमुख समुद्री क्षेत्र में औसत तापमान में लगातार भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो पिछले सभी रिकॉर्ड्स को पीछे छोड़ चुकी है।

भारत के मौसम और मानसून पर प्रभाव

देश के लिए यह मजबूत होता अल नीनो बारिश की कमी और बढ़ते तापमान के रूप में बड़ी चिंता बनकर उभरा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 के दौरान देश का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से लगभग 13 प्रतिशत कम बारिश के साथ समाप्त हुआ था। इसके अलावा, आगामी महीनों में दक्षिण एशिया के अधिकांश हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक रहने तथा मध्य और दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा होने का जोखिम बना हुआ है।

वर्ष 2027 की शुरुआत तक रह सकता है असर

मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का मौसम पूरी तरह से केवल अल नीनो पर निर्भर नहीं रहता, क्योंकि इसमें अन्य स्थानीय और जलवायु संबंधी कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, प्रशांत महासागर के अत्यधिक गर्म होने से तीव्र गर्मी और असामान्य मौसम की घटनाओं का खतरा काफी बढ़ गया है। इस जलवायु प्रक्रिया का प्रभाव वर्ष 2027 की शुरुआत तक बने रहने का अंदेशा जताया जा रहा है, और वैज्ञानिक लगातार समुद्री स्थितियों की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं।