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श्रीलंका के नए संगठित अपराध विधेयक पर मानवाधिकार संगठनों की चिंता, मनमाने ढंग से हिरासत और यातना का अंदेशा

श्रीलंका के नए संगठित अपराध विधेयक पर मानवाधिकार संगठनों की चिंता, मनमाने ढंग से हिरासत और यातना का अंदेशा

श्रीलंका में हाल ही में पेश किया गया संगठित अपराध निवारण विधेयक एक बार फिर गंभीर बहसों के घेरे में आ गया है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि इस नए प्रस्तावित कानून से देश में नागरिकों के अधिकारों का हनन हो सकता है और मनमाने ढंग से हिरासत में रखने तथा यातना मिलने का खतरा बढ़ सकता है।

श्रीलंका के नए संगठित अपराध विधेयक पर मानवाधिकार संगठनों की चिंता, मनमाने ढंग से हिरासत और यातना का अंदेशा

पुराने और दमनकारी कानूनों की वापसी की आशंका

विशेषज्ञों के अनुसार, संसद के सामने लाया गया यह नया विधेयक पुराने आतंकवाद निवारण अधिनियम (पीटीए) के कई विवादित प्रावधानों को दोहराता है। राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके के नेतृत्व वाले गठबंधन ने अपने चुनाव घोषणापत्र में दमनकारी कानूनों को समाप्त करने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने का वादा किया था। हालांकि, अधिकार समूहों का कहना है कि यह नया कानून आपराधिक न्याय प्रणाली के बुनियादी सुरक्षा उपायों को कमजोर करता है और मौजूदा कानूनों से बाहर एक समानांतर कानूनी ढांचा तैयार करता है।

विधेयक के प्रमुख विवादास्पद बिंदु

  • लंबी हिरासत: इस कानून के तहत बिना पर्याप्त न्यायिक निगरानी या पुख्ता सबूत के लंबे समय तक हिरासत में रखने की अनुमति मिल सकती है।
  • पुलिस के पास स्वीकारोक्ति: पुलिस के सामने दिए गए बयानों को अदालत में स्वीकार्य बनाए जाने से जबरदस्ती और यातना मिलने की आशंका बढ़ जाती है।
  • व्यापक निगरानी अधिकार: पुलिस को संचार माध्यमों की निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से डेटा निकालने और बिना वारंट के तलाशी लेने के व्यापक अधिकार मिलने की बात कही गई है।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर: मीडिया रिपोर्टिंग और अदालती कार्यवाही पर प्रतिबंध लगने से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

व्यापार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर असर

मानवाधिकार संगठनों का यह भी कहना है कि इस प्रकार के कानून यूरोपीय संघ के साथ श्रीलंका के व्यापारिक संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं। यूरोपीय बाजार में शुल्क-मुक्त पहुंच बनाए रखने के लिए श्रीलंका को मानवाधिकारों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मानकों और प्रतिबद्धताओं का पालन करना आवश्यक है। अधिकार समूहों ने सरकार से इस विधेयक को वापस लेने और सभी पक्षों के साथ खुली चर्चा कर नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है।