भारत और पाकिस्तान के संबंधों में आया स्थायी बदलाव, कूटनीति और रणनीतिक रुख में बड़ा फेरबदल
भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुरानी कूटनीतिक और सैन्य रणनीतियों में अब बड़ा बदलाव आ चुका है। वर्ष 2016 के बाद से दोनों पड़ोसी देशों के बीच उच्चस्तरीय वार्ता का दौर पूरी तरह थम गया है। यह स्थिति महज अस्थायी नाराजगी नहीं है, बल्कि देश की विदेश नीति में एक बुनियादी परिवर्तन को दर्शाती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और कूटनीतिक पहल
दशकों तक यह परिपाटी रही कि सैन्य टकराव के बाद तनाव कम होता और शांति वार्ता शुरू होती, जो अंततः फिर से संघर्ष में बदल जाती थी। अतीत में पारंपरिक युद्धों के बाद 1980 के दशक के उत्तरार्ध से आतंकवाद आधारित रणनीति को बढ़ावा मिला। भारत ने कई बार शांति की पहल की, लेकिन जवाब में सैन्य उकसावे या आतंकवादी गतिविधियां सामने आईं। वर्ष 1999 की लाहौर बस यात्रा और 2008 की कूटनीतिक वार्ताओं के दौरान भी ऐसे ही हालात देखे गए, जिससे पाकिस्तान की आंतरिक व्यवस्था की सीमाएं उजागर हुईं।
भारत के रुख में बदलाव और नया सिद्धांत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरुआत में शांति बहाل करने के प्रयास किए, जिनमें शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रण और लाहौर की यात्रा शामिल थी। हालांकि, पठानकोट हमले और उसके बाद के घटनाक्रमों ने रणनीतिक संयम की नीति को समाप्त कर दिया। इसके बाद यह स्पष्ट सिद्धांत अपनाया गया कि बातचीत और आतंकवाद एक साथ नहीं चल सकते। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि द्विपक्षीय वार्ताओं की मेज पर तभी वापसी होगी जब पड़ोसी देश अपनी भूमि से संचालित होने वाले आतंकी तंत्र को पूरी तरह समाप्त कर देगा।

सैन्य मोर्चे पर बदली धारणा
रणनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भारत के सैन्य सिद्धांत में भी व्यापक परिवर्तन आया है। पाकिस्तान के परमाणु हथियारों के जखीरे के कारण भारत की पारंपरिक सैन्य कार्रवाई रुकने की पुरानी धारणा को भी अब चुनौती मिल चुकी है। जब तक वहां की सोच और प्राथमिकताओं में बुनियादी राजनीतिक बदलाव नहीं आता, तब तक दोनों राष्ट्रों के बीच संवादहीनता का यही दौर बने रहने की संभावना है।
