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भारतीय हिमालयी क्षेत्र में पारंपरिक पौधों की 5,404 उपयोगी प्रजातियों की पहचान, अध्ययन में हुआ खुलासा

भारतीय हिमालयी क्षेत्र में पारंपरिक पौधों की 5,404 उपयोगी प्रजातियों की पहचान, अध्ययन में हुआ खुलासा

हाल ही में सामने आए एक विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में पारंपरिक रूप से उपयोगी 5,404 पादप और जैविक प्रजातियों की पहचान की गई है। हिमालय की गोद में बसे इन क्षेत्रों के जंगलों और घास के मैदानों में रहने वाले स्थानीय लोगों के लिए प्रकृति केवल पर्यावरण का हिस्सा नहीं, बल्कि भोजन, औषधि, ईंधन और निर्माण सामग्री का मुख्य स्रोत है। इस बिखरी हुई और मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ट्रांसफर होने वाली जानकारी को सहेजने के लिए शोधकर्ताओं ने 146 जिलों में किए गए 2,283 पिछले अध्ययनों का विश्लेषण किया है।

भारतीय हिमालयी क्षेत्र में पारंपरिक पौधों की 5,404 उपयोगी प्रजातियों की पहचान, अध्ययन में हुआ खुलासा

पारंपरिक ज्ञान और जैव विविधता का दायरा

इस शोध के दौरान फंगस, लाइकेन और शैवाल के साथ-साथ कुल 5,404 उपयोगी प्रजातियों की सूची तैयार की गई है, जिनमें से लगभग 90 प्रतिशत फूल वाले पौधे शामिल हैं। इन प्रजातियों में से करीब आधे पौधे जड़ी-बूटियों की श्रेणी में आते हैं। अध्ययन में सामने आया कि इनमें से अधिकांश प्रजातियों के एक से अधिक उपयोग हैं। उदाहरण के लिए, एक ही पौधे का इस्तेमाल भोजन, पशुओं के चारे, फाइबर, ईंधन या पारंपरिक अनुष्ठानों और धार्मिक गतिविधियों में किया जाता है। रिकॉर्ड के अनुसार, इनमें से लगभग 96 प्रतिशत प्रजातियों का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में किसी न किसी रूप में किया जाता रहा है, हालांकि वैज्ञानिक प्रमाण के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है।

शोध में राज्यों की स्थिति और आंकड़े

आरंभिक आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में सबसे अधिक 44.6 प्रतिशत उपयोगी प्रजातियों का उल्लेख मिला, जिसके बाद हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश का स्थान रहा। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि उत्तराखंड में अन्य क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक शोध कार्य हुआ है, जिससे वहां की प्रजातियों की संख्या अधिक दर्ज की गई। जब सभी क्षेत्रों में समान संख्या में प्रकाशनों के आधार पर दोबारा गणना की गई, तो पूर्वी हिमालय के कई राज्यों में कहीं अधिक समृद्ध जैव विविधता के संकेत मिले। शोधकर्ताओं का मानना है कि वैज्ञानिक रिकॉर्ड में अभी कई और प्रजातियां शामिल होना बाकी हैं।

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संरक्षण की चुनौतियां और भविष्य का खतरा

अध्ययन में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि पौधों के हिस्सों को एकत्र करने का तरीका कई बार उनके अस्तित्व के लिए खतरनाक साबित होता है। करीब 51 प्रतिशत प्रजातियों में ऐसे अंगों का उपयोग किया जाता है जिन्हें तोड़ने से पौधे को नुकसान पहुंच सकता है या उसकी वृद्धि रुक सकती है। इसके अलावा, बदलती जीवनशैली और पलायन के कारण बुजुर्ग वैद्यों और जानकारों से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान नई पीढ़ी तक नहीं पहुंच पा रहा है। विशेषज्ञों ने मांग की है कि स्थानीय समुदायों की सहमति से इस ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया जाए और अत्यधिक दबाव वाली औषधीय प्रजातियों की नियंत्रित खेती को बढ़ावा दिया जाए ताकि प्राकृतिक धरोहर को बचाया जा सके।