संकल्प और मन का नियंत्रण: जीवन में सफलता पाने का मार्ग
जीवन में कई ऐसे अभियान और उद्देश्य होते हैं जिनकी कोई निश्चित फिनिशिंग लाइन नहीं होती है। ऐसे मामलों में व्यक्ति को लगातार आगे बढ़ना पड़ता है और जरूरत पड़ने पर बड़ी छलांग भी लगानी होती है। आज के समय में छोटे-मोटे काम और सामान्य सफलताएं बहुत अधिक अर्थ नहीं रखती हैं। आज की नई पीढ़ी कुछ नया और अनूठा करने की कला में पूरी तरह माहिर है। उनकी इस तैयारी में उत्साह और सक्रियता साफ दिखाई देती है, लेकिन कई बार उनमें मजबूत संकल्प-शक्ति की कुछ कमी देखने को मिलती है। इस आवश्यक शक्ति के अभाव में वे अक्सर अपनी यात्रा के आधे रास्ते में ही थककर रुक जाते हैं। इसलिए किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए संकल्प का होना बहुत जरूरी है।

सात्विक संकल्प और संयम का महत्व
जब भी जीवन में किसी प्रकार का संकल्प लिया जाए, तो इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि वह पूरी तरह से सात्विक होना चाहिए। यदि संकल्प सात्विक नहीं होगा, तो वह किसी भी समय हिंसा या नकारात्मकता में बदल सकता है। इसलिए हमेशा संयम और विवेक के साथ ही संकल्प लेना चाहिए। आमतौर पर लोगों की यह गलतफहमी होती है कि संकल्प केवल मन के स्तर पर लिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि संकल्प का संबंध केवल मन से नहीं, बल्कि सीधे तौर पर आत्मा, हृदय और मस्तिष्क से जुड़ा हुआ होता है। यह तीनों मिलकर किसी निश्चय को आधार देते हैं।

मन की बाधा और नियंत्रण की आवश्यकता
दूसरी तरफ, मन की प्रवृत्ति इस बात की होती है कि वह लिए गए संकल्प को तोड़ने का काम करे। इसे एक साधारण उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए किसी व्यक्ति ने यह पक्का संकल्प लिया कि वह सुबह सवेरे जल्दी उठेगा और सैर पर जाएगा। इसके लिए उसने रात को बाकायदा अलार्म लगाया। जिन लोगों को नींद जल्दी न खुलने की चिंता होती है, वे तो अपने पास दो-दो मोबाइल में अलार्म सेट कर लेते हैं। लेकिन जैसे ही वह निर्धारित समय पर अलार्म बजता है, तो अंदर से कोई हाथ आकर उसे बंद कर देता है और मन ही मन समझा देता है कि आज रहने देते हैं, कल से शुरुआत करेंगे। यह पूरा कार्य और भटकाव मन का ही होता है। इसलिए जीवन में जब भी कोई नया संकल्प लें, तो सबसे पहले अपने मन को पूरी तरह नियंत्रित करना सीखें। जब मन पर नियंत्रण हो जाता है, तब लिया गया संकल्प शत-प्रतिशत सफल होता है।
