Search for:
  • Home/
  • ओपिनियन/
  • काम और वोट का रिश्ता: क्या जवाबदेही तय करने का समय आ गया है?
काम और वोट का रिश्ता: क्या जवाबदेही तय करने का समय आ गया है?

काम और वोट का रिश्ता: क्या जवाबदेही तय करने का समय आ गया है?

हाल ही में मध्य प्रदेश के गुना में एक नागरिक द्वारा केंद्रीय मंत्री के समक्ष सड़क निर्माण का मुद्दा उठाए जाने के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता और राजनेताओं के संबंधों पर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है। इस घटना से यह सवाल सामने आता है कि क्या नागरिकों को अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए नेताओं के सामने याचक की मुद्रा में रहना चाहिए या फिर यह उनका अधिकार है। लोकतंत्र में जनहित के कार्य जनता के ही धन से होते हैं, इसलिए जनप्रतिनिधियों और जनता का रिश्ता अनुकंपा का नहीं बल्कि पूरी तरह उत्तरदायित्व का होना चाहिए।

काम और वोट का रिश्ता: क्या जवाबदेही तय करने का समय आ गया है?

नागरिक और मतदाता के दो अलग रूप

भारतीय लोकतंत्र का एक बड़ा विरोधाभास यह है कि एक नागरिक के रूप में लोग सड़कों के गड्ढों, प्रदूषण और प्रशासनिक कमियों पर खुलकर शिकायत करते हैं, लेकिन जब बात मतदान की आती है, तो मुद्दे पूरी तरह बदल जाते हैं। चुनावों के दौरान कई बार जाति, धर्म, समुदाय, कल्याणकारी योजनाएं और भावनात्मक नैरेटिव विकास कार्यों पर भारी पड़ जाते हैं। यही वजह है कि खस्ताहाल सड़कें या अन्य स्थानीय परेशानियां अक्सर मतपेटी तक पहुंचते-पहुंचते गायब हो जाती हैं और मतदाता अलग प्राथमिकताओं के आधार पर अपना फैसला सुनाते हैं।

काम और वोट का रिश्ता: क्या जवाबदेही तय करने का समय आ गया है?

वोट की ताकत और राजनीतिक जवाबदेही

शोध बताते हैं कि केवल बुनियादी विकास कार्य हमेशा चुनावी जीत की गारंटी नहीं बनते, क्योंकि मतदाता जटिल राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों के आधार पर निर्णय लेते हैं। हालांकि, यदि नागरिक संगठित होकर जवाबदेही को अपना मुख्य पैमाना बना लें, तो राजनीतिक दलों को भी यह समझ आ जाएगा कि बिना काम के समर्थन नहीं मिलेगा। ‘काम नहीं, तो वोट नहीं’ का अर्थ किसी खास दल का विरोध करना नहीं, बल्कि हर जनप्रतिनिधि को यह एहसास कराना है कि जनता अब केवल भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि ठोस प्रदर्शन के आधार पर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेगी।