एनसीईआरटी की कक्षा 9 की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक में सातवीं शताब्दी से विदेशी आक्रमणों का जिक्र
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने कक्षा 9 की नई सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी इंडिया एंड बियॉन्ड-पार्ट 2’ को हाल ही में जारी कर दिया है। यह पुस्तक नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के कुछ महीनों बाद लाई गई है, जिसका पहला हिस्सा पहले ही जारी किया जा चुका था।

इस नई पाठ्यपुस्तक में उल्लेख किया गया है कि सातवीं शताब्दी के बाद से भारतीय उपमहाद्वीप में कई आक्रमण हुए, जो मुख्य रूप से क्षेत्रीय विस्तार और धार्मिक उद्देश्यों से प्रेरित थे। पुस्तक के अनुसार, उपमहाद्वीप की उपजाऊ भूमि और वहां की कृषि से मिलने वाला अतिरिक्त उत्पादन लोगों की आर्थिक समृद्धि का कारण तो था ही, साथ ही यह बाहरी आक्रमणकारियों को आकर्षित करने का एक प्रमुख कारण भी बना।
‘रेजिस्टेंस एंड रिजिलिएंस’ अध्याय में संघर्ष और प्रतिरोध का इतिहास
पुस्तक में ‘रेजिस्टेंस एंड रिजिलिएंस’ (प्रतिरोध और सहनशीलता) शीर्षक से एक अध्याय शामिल किया गया है। इसमें इस बात का दस्तावेजीकरण किया गया है कि किस प्रकार भारतीय शासकों और विभिन्न समुदायों ने अरब, तुर्क, मुगल और यूरोपीय ताकतों के खिलाफ अपना प्रतिरोध दर्ज कराया था। मध्य सातवीं शताब्दी से शुरू हुए इन आक्रमणों का दक्कन, मालवा, कश्मीर और राजस्थान के शासकों द्वारा सामना किए जाने का विवरण इसमें मिलता है।
अध्याय में गजनवी के सुल्तान महमूद द्वारा 1001 ईस्वी में हिंदू शाही राजवंश के जयपाल के खिलाफ किए गए हमलों का भी जिक्र है। ग ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी के दौरान उत्तर और पश्चिम भारत में तुर्की आक्रमणों के प्रभाव का वर्णन है, जबकि प्रायद्वीपीय भारत इन नियंत्रणों से दूर रहा।
मुगल काल में विभिन्न समुदायों का संघर्ष
पुस्तक में मुगल साम्राज्य के दौरान विभिन्न समूहों के विरोध और संघर्ष को भी विस्तार से समझाया गया है:
- जाट समुदाय का विद्रोह: गंगा-Yamuna दोआब क्षेत्र में भारी कराधान और शोषण के खिलाफ जाटों ने 1669 में गोकुल जाट के नेतृत्व में विद्रोह किया था।
- सिखों का संघर्ष: सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत से सिख मामलों में मुगल राज्य के बढ़ते हस्तक्षेप और गुरु अर्जन देव तथा गुरु तेग बहादुर के बलिदान का उल्लेख किया गया है।
- अन्य प्रमुख संघर्ष: 1582 में उदयपुर के पासDewair की लड़ाई और असम में अहोम प्रतिरोध (जैसे 1671 की साराघाट की लड़ाई) को भी पुस्तक में जगह मिली है।
पुस्तक में इस बात पर जोर दिया गया है कि प्रतिरोध और सहनशीलता आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। सहनशीलता ही प्रतिरोध की रीढ़ बनती है और इन दोनों ने मिलकर भारतीय समाज को विभिन्न युगों में खुद को बचाए रखने में मदद की है। यह कालखंड केवल संघर्ष और आक्रमण तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें संघर्ष के साथ-साथ आपसी सहयोग के उदाहरण भी देखने को मिलते हैं।
