लवलीना बोरगोहाईं की शानदार सफलता और खिलाड़ियों को कम आंकने की प्रवृत्ति पर एक नजर
भारतीय बॉक्सर लवलीना बोरगोहाईं ने एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया है। उनकी इस शानदार उपलब्धि ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि किसी भी खिलाड़ी की क्षमता और मेहनत को समय से पहले कम आंकना या उनकी आलोचना करना पूरी तरह से गलत है। जब उन्होंने एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक अपने नाम किया, तो आलोचकों और नकारात्मकता फैलाने वालों के मुंह अपने आप बंद हो गए।

राष्ट्रमंडल खेलों के बाद का दौर और अनावश्यक आलोचना
इससे पहले ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में लवलीना को ऑस्ट्रेलिया की प्रतिष्ठित बॉक्सर और दो बार की विश्व चैंपियनशिप मेडलिस्ट एमा सू ग्रीनट्री के खिलाफ बेहद करीबी मुकाबले में फाइनल हार का सामना करना पड़ा था। उस मामूली अंतर से मिली हार के बाद उन्हें भारी ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ा था। दुखद पहलू यह रहा कि कई खेल पत्रकारों ने भी अपना नजरिया खोते हुए उनके खिलाफ नकारात्मकता फैलाई थी। जबकि सच्चाई यह थी कि लवलीना ने किसी भी दौर में आगे बढ़ने के लिए खुद से कोई बाई नहीं मांगी थी। वह वहां कड़ी मेहनत करने के लिए मौजूद थीं और खेलों में किस्मत की भूमिका होने के बावजूद उन्हें इस तरह निशाना बनाया जाना पूरी तरह अनुचित था।
एशियाई खेलों में ऐतिहासिक प्रदर्शन और कोच की सलाह
लवलीना ने इन सभी आलोचनाओं को दरकिनार करते हुए एशियाई खेलों में इतिहास रच दिया। वह एशियाई खेलों के फाइनल में दो बार पहुंचने वाली भारत की पहली बॉक्सर बनीं, जो महान मैरी कॉम के रिकॉर्ड से भी आगे का सफर था। सेमीफाइनल मुकाबले के दौरान शुरुआती दौर में वह रक्षात्मक खेल की वजह से पिछड़ गईं थीं। उस समय कोच सैंटियागो नीवा ने अंतराल के दौरान उन्हें पूरी तरह से आक्रामक होकर खेलने की सलाह दी। कोच के इन निर्देशों का पालन करते हुए लवलीना ने दूसरे राउंड में शानदार वापसी की और मुकाबले पर पूरी तरह से अपनी पकड़ बना ली। वहां मौजूद अन्य भारतीय खिलाड़ियों और दल के सदस्यों ने उनके हर एक पंच पर उनका जमकर उत्साहवर्धन किया।

एथलीटों का समर्थन और सम्मान क्यों है जरूरी
जब लवलीना से इस पूरी ट्रोलिंग और आलोचनाओं के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब बेहद स्पष्ट था कि इन बातों की कोई परवाह नहीं करती हैं। उनका यह सफर और अंत में स्वर्ण पदक जीतना उन लोगों के लिए एक बड़ी सीख होना जो बिना सोचे-समझे खिलाड़ियों के खेल को कमतर आंकने लगते हैं। यह पूरी घटना इस बात का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती है कि यदि खेल प्रेमी या मीडिया किसी एथलीट का समर्थन नहीं कर सकते, तो उन्हें अपने हाल पर छोड़ देना चाहिए या चुप रहना चाहिए। किसी भी खिलाड़ी को हतोत्साहित करना, जज करना या उनकी उपलब्धियों को कम आंकने की कोशिश करना कभी भी सही नहीं होता है और इसका कोई फायदा नहीं मिलता।
