किशन पटनायक के चिंतन में बुद्धिजीवी वर्ग की भूमिका और बाजारवाद की समीक्षा
किशन पटनायक के वैचारिक चिंतन में आधुनिक सभ्यता, तकनीक, विकास मॉडल और बुद्धिजीवी वर्ग की सामाजिक भूमिका के सवाल बेहद अहम माने जाते हैं। उनका मानना था कि समाज की दिशा तय करने और समस्याओं को समझने में बुद्धिजीवी वर्ग की एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। आज के दौर में आधुनिक विकास और बाजारवाद के दबाव के बीच बौद्धिक स्वतंत्रता और सामाजिक सरोकार किस प्रकार प्रभावित हो रहे हैं, इस पर उनके लेखन में विस्तार से चर्चा मिलती है।

बुद्धिजीवी वर्ग और समाज में उसकी नियामक भूमिका
किशन पटनायक का यह स्पष्ट दृष्टिकोण था कि समाज में धर्म, संस्कृति, शिक्षा, जीवन और भविष्य जैसी दीर्घावधि धारणाओं का निर्माण और उनकी व्याख्या हमेशा से बुद्धिजीवी वर्ग ही करता है। वे समाज के नियामक के रूप में कार्य करते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आधुनिक समय में एक बड़े बौद्धिक वर्ग का कर्म बिकाऊ और गुलाम मानसिकता से ग्रसित हो चुका है। उनके अनुसार, समाज में फैलने वाली विसंगतियों और अनैतिकता के विभिन्न रूपों के लिए अंततः यही नियामक बुद्धिजीवी वर्ग जिम्मेदार होता है।
आधुनिक विकास और बाजारवाद की आलोचना
आधुनिक सभ्यता के संकट को वे बुद्धिजीवी वर्ग की भूमिका के साथ जोड़कर देखते थे। विदेशी पूंजी और आधुनिक तकनीक को विकास के नाम पर अनिवार्य मान लेना, और इसके चलते समाज के एक बड़े वंचित हिस्से की उपेक्षा कर देना, उनके अनुसार एक गंभीर वैचारिक संकट है। उनका तर्क था कि आर्थिक उपनिवेशीकरण की इन धारणाओं के कारण समतावादी सोच के लिए जगह कम होती जाती है।
देशीय चिंतन और वैकल्पिक सभ्यता का स्वप्न
किशन पटनायक ने अपनी वैचारिक धारा को ‘देशीय चिंतन’ का नाम दिया, जिसे वे किसी संकीर्ण मतवाद से नहीं बल्कि गांधीवादी चेतना के व्यापक परिप्रेक्ष्य से जोड़ते हैं। उनका राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष हमेशा दबी हुई मानवता के पुनरुत्थान और वंचित आबादी के अधिकारों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा। वे मानते थे कि समाज की दशा और दिशा बदलने के लिए बुद्धिजीवी वर्ग को अपनी आत्म-समीक्षा करनी होगी और जनता के प्रति अपनी वास्तविक जवाबदेही को समझना होगा।
