भारतीय खेलों का नया लक्ष्य: राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों से आगे बढ़कर ओलिम्पिक पर हो फोकस
भारतीय एथलेटिक्स महासंघ के पूर्व अध्यक्ष और ओलिम्पियन डॉ. एडिल जे. सुमरिवाला ने भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन का स्तर ऊपर उठाने के लिए एक अहम सुझाव दिया है। उनका मानना है कि अब समय आ गया है जब हमें राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों से आगे बढ़कर ओलिम्पिक खेलों को अपना मुख्य लक्ष्य बनाना चाहिए। इस दिशा में क्षेत्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतने पर मिलने वाली नकद प्रोत्साहन राशि को समाप्त करने पर विचार किया जाना चाहिए।

ओलिम्पिक और विश्व स्तर को बनाएं मानक
खेल मंत्रालय की विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत एथलीटों को पर्याप्त वित्तीय सहायता और सुविधाएं दी जाती हैं। ऐसे में प्रोत्साहन राशि केवल ओलिम्पिक और हर दो साल में आयोजित होने वाली विश्व चैम्पियनशिप के लिए ही दी जानी चाहिए, क्योंकि यही खेल जगत के सर्वोच्च मंच हैं। खेल जानकारों का मानना है कि एशियाई और राष्ट्रमंडल स्तर पर पदक जीतना अब भारतीय खिलाड़ियों के लिए अधिक कठिन नहीं रहा है, इसलिए उन्हें अपनी वास्तविक क्षमता साबित करने के लिए वैश्विक मंच यानी ओलिम्पिक पर उत्कृष्टता दिखानी होगी।
चोट और फिटनेस से जुड़ी समस्याएं
क्षेत्रीय स्पर्धाओं में मिलने वाले भारी नकद पुरस्कारों के कारण कई बार खिलाड़ी और उनके कोच फिटनेस से जुड़ी समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं। मामूली चोटों के बावजूद प्रतियोगिता में भाग लेने के जोखिम और नागोया जैसे आयोजनों में सामने आए मामलों से यह स्पष्ट होता है कि जवाबदेही तय करना जरूरी है। कई बार खिलाड़ी अगली प्रतियोगिताओं के लिए खुद को बचाने की सोच रखते हैं, जिससे उनका पूरा ध्यान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम ऊंचा करने के बजाय क्षेत्रीय स्तर तक ही सीमित रह जाता है।

उत्तरदायित्व और भविष्य की दिशा
यदि क्षेत्रीय खेलों में भाग लेने या पदक जीतने पर मिलने वाले पैसों को सीमित कर दिया जाए, तो खिलाड़ियों में फिटनेस छिपाकर मैदान पर उतरने की प्रवृत्ति पर लगाम लगेगी। वैश्विक प्रतियोगिताओं पर ध्यान केंद्रित करने और नियमों को कड़ा करने से खिलाड़ियों की जवाबदेही बढ़ेगी, जिससे वे देश के लिए सर्वोच्च खेल मंच पर बेहतरीन प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित होंगे।
