हिमालयी क्षेत्रों में मंडरा रहा बड़ा आपदा का खतरा, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी
तिब्बत में ग्लेशियर ढहने और नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद वैज्ञानिकों ने पूरे हिमालय क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या किसी एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंदुकुश हिमालय में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और पर्माफ्रोस्ट के अस्थिर होने से पूरे क्षेत्र पर संकट मंडरा रहा है।

बढ़ता जा रहा है आपदाओं का जोखिम
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस पूरे पर्वतीय क्षेत्र में ग्लेशियर बेहद तेज गति से पिघल रहे हैं, जिससे भूस्खलन, ग्लेशियल झीलों के फटने और अचानक आने वाली भयंकर बाढ़ का जोखिम काफी बढ़ गया है। इस विशाल भूगोल में लगभग 200 करोड़ लोग निवास करते हैं। हालिया आपदाओं के बाद विशेषज्ञों ने हिमालयी देशों से आपसी सहयोग बढ़ाने, साक्षा पहाड़ों और नदियों की निगरानी को मजबूत करने तथा समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था दुरुस्त करने की अपील की है।
निगरानी का अभाव और जलवायु परिवर्तन की चुनौती
एक पर्यावरण रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में करीब 40,000 ग्लेशियर मौजूद हैं, लेकिन इनमें से केवल 21 की ही पर्याप्त रूप से निगरानी की जा रही है। यह क्षेत्र अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, म्यांमार, नेपाल और पाकिस्तान तक फैला हुआ है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्ष 2010 से 2019 के दौरान इस क्षेत्र के ग्लेशियर पिछले दशक की तुलना में 65 प्रतिशत अधिक तेजी से पिघले हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित भी कर लिया जाए, तब भी इस सदी के अंत तक इस क्षेत्र के लगभग एक-तिहाई ग्लेशियर समाप्त हो सकते हैं।
भारत में ग्लेशियल झीलों का खतरा
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 200 ग्लेशियल झीलों के किनारे टूटने का खतरा बना हुआ है, जिनमें से 56 झीलें अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में आती हैं। इससे पहले उत्तराखंड और सिक्किम में इस तरह की आपदाएं आ चुकी हैं। दुर्गम भूगोल और उच्च लागत के कारण सभी ग्लेशियरों की निगरानी करना कठिन है, इसलिए वैज्ञानिकों का सुझाव है कि उन संवेदनशील स्थानों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जिनके नीचे बड़े बांध, कस्बे या गांव बसे हुए हैं। उपग्रहों और जमीन पर लगाए गए सेंसर की मदद से पहाड़ों की हलचल पर नजर रखी जा सकती है।
