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समृद्धि के पीछे छिपा सच: एक गरीब की अंतिम विदाई और व्यवस्था की सच्चाई

समृद्धि के पीछे छिपा सच: एक गरीब की अंतिम विदाई और व्यवस्था की सच्चाई

गोवा से सामने आई एक हृदयविदारक घटना ने समाज में फैले दिखावे और वास्तविक संपन्नता के बीच के अंतर को उजागर किया है। गणेश चतुर्थी के पावन पर्व की तैयारियों के बीच परनेम के देउलवाड़ा वार्ड में एक 65 वर्षीय व्यक्ति अशोक गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। स्वास्थ्य केंद्र ले जाते समय रास्ते में ही उनकी मौत हो गई, जिसके बाद उनके परिवार के सामने ऐसा संकट खड़ा हुआ जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

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अंतिम विदाई का संकट और गरीबी की लाचारी

अशोक किसी समय होटल में काम करते थे, लेकिन दो साल पहले पैर कट जाने के कारण उनकी जिंदगी पूरी तरह सिमट गई थी। उनकी दो विधवा बहनें सरकारी सहायता के सहारे जीवनयापन कर रही थीं और बारी-बारी से उनकी देखभाल करती थीं। भाई की मृत्यु के बाद दोनों बहनों ने मुफ्त अंतिम संस्कार की उम्मीद में शव को श्मशान घाट पहुंचाया। हालांकि, वहां न तो कोई कर्मचारी मौजूद था और न ही उनके पास अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक लकड़ी खरीदने के साधन थे।

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व्यवस्था की अनदेखी और कड़वी सच्चाई

संसाधनों के अभाव में दोनों बहनों को मजबूरी में शव को वहीं छोड़कर घर लौटना पड़ा। अगली सुबह पुलिस को श्मशान घाट से अज्ञात शव मिलने के बाद जांच शुरू हुई और पुलिस अधिकारी अशोक के छोटे से घर तक पहुंचे। बाद में रिश्तेदारों की मदद से पैसे जुटाए गए और लकड़ी की व्यवस्था कर अंतिम संस्कार पूरा किया गया। यह घटना सोचने पर मजबूर करती है कि क्या कोई समाज तब तक वास्तव में समृद्ध कहा जा सकता है, जब तक उसके सबसे कमजोर नागरिकों को सम्मान के साथ विदा होने का अधिकार भी न मिले।