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आर्थिक वृद्धि अब चुनाव जीतने की गारंटी क्यों नहीं रही?

आर्थिक वृद्धि अब चुनाव जीतने की गारंटी क्यों नहीं रही?

आर्थिक क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि मजबूत आर्थिक आंकड़ों और तेज जीडीपी ग्रोथ के बावजूद अब चुनाव जीतना आसान नहीं रह गया है। अमेरिका के राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य में इन दिनों एक नया विरोधाभास देखने को मिल रहा है, जहां अनुकूल आर्थिक परिस्थितियों के बाद भी शासक दल को जनसमर्थन में गिरावट का सामना करना पड़ रहा है।

आर्थिक वृद्धि अब चुनाव जीतने की गारंटी क्यों नहीं रही?

बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन का संकट

तीसरी तिमाही में आर्थिक विकास दर तेजी से बढ़कर चार प्रतिशत के करीब पहुंच गई है, लेकिन आम जनता के स्तर पर इसका सकारात्मक प्रभाव नजर नहीं आ रहा है। कई नागरिकों को यह आर्थिक तेजी सही प्रकार की नहीं लगती क्योंकि इसके साथ ही जीवन-यापन की लागत में भारी इजाफा हुआ है। इस स्थिति का मुख्य लाभ केवल उच्च वर्ग के उपभोक्ताओं को मिल रहा है, जबकि आम आदमी बढ़ती महंगाई से परेशान है।

एआई तकनीक और ऊर्जा संकट का प्रभाव

मौजूदा आर्थिक वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई क्षेत्र में भारी निवेश के कारण है। हालांकि, इस तकनीकी क्रांति को लेकर मतदाताओं में पहले की तकनीकों की तुलना में कहीं अधिक अंदेशा और चिंता है। इसके साथ ही, ऊर्जा की बढ़ती मांग और भू-राजनीतिक तनावों के चलते पेट्रोल, बिजली और होम लोन की ब्याज दरों में भारी बढ़ोतरी हुई है। होम लोन दरें सात प्रतिशत से ऊपर पहुंच जाने के कारण घर खरीदना भी बेहद कठिन हो गया है।

आर्थिक वृद्धि अब चुनाव जीतने की गारंटी क्यों नहीं रही?

युवाओं में भविष्य को लेकर बढ़ती चिंता

विशेष रूप से युवा वर्ग में भविष्य में रोजगार छिन जाने का डर तेजी से बढ़ रहा है। वेतन-वृद्धि की दरें महंगाई के मुकाबले पीछे छूट गई हैं, जिससे समाज में आर्थिक असमानता और नाराजगी बढ़ रही है। इन तमाम पहलुओं से यह स्पष्ट होता है कि यदि व्यापक आर्थिक वृद्धि आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन को आसान नहीं बनाती, तो राजनीतिक स्तर पर उसका लाभ मिलना मुश्किल हो जाता है।