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छत्तीसगढ़: स्कूल और आंगनबाड़ी जाने के लिए नाला पार करने को मजबूर हैं मासूम बच्चे

छत्तीसगढ़: स्कूल और आंगनबाड़ी जाने के लिए नाला पार करने को मजबूर हैं मासूम बच्चे

छत्तीसगढ़ के डौंडीलोहारा विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत खड़बत्तर के आश्रित ग्राम टूटामारदी में बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए भारी जोखिम उठाना पड़ रहा है। गांव के बीच से गुजरने वाले खोल नाले पर पुल न होने के कारण बारिश के दिनों में स्थिति काफी गंभीर हो जाती है और बच्चों को तेज बहाव के बीच से गुजरना पड़ता है। स्थानीय निवासियों के अनुसार, भौगोलिक स्थिति के कारण यह गांव दो हिस्सों में बंटा हुआ है, जिससे प्राथमिक शाला और आंगनबाड़ी तक पहुंचने के लिए नाला पार करना अनिवार्य हो जाता है।

छत्तीसगढ़: स्कूल और आंगनबाड़ी जाने के लिए नाला पार करने को मजबूर हैं मासूम बच्चे

भौगोलिक स्थिति और बच्चों की मुश्किलें

टूटामारदी गांव में लगभग 120 परिवार निवास करते हैं, जिनमें से करीब 80 परिवार नाले के इस पार और 40 परिवार बड़े पारा तथा आमली पारा में नाले के उस पार रहते हैं। गांव का प्राथमिक विद्यालय और आंगनबाड़ी केंद्र बड़े पारा में संचालित होता है, जिसके चलते नाले के इस तरफ रहने वाले लगभग 40 बच्चों को रोजाना अपनी जान जोखिम में डालकर नाला पार करना पड़ता है। सामान्य दिनों में भले ही अधिक परेशानी न हो, लेकिन बारिश के मौसम में जलस्तर बढ़ने से बच्चों और उनके अभिभावकों की मुश्किलें काफी बढ़ जाती हैं।

अभिभावकों की चिंता और आंगनबाड़ी के मासूम

छोटे बच्चों के लिए अकेले नाला पार करना संभव नहीं होता, इसलिए माता-पिता उन्हें अपनी गोद या पीठ पर बैठाकर दूसरी तरफ पहुंचाते हैं। स्थानीय महिलाओं ने बताया कि सबसे अधिक कठिनाई उन छोटे बच्चों को होती है जो आंगनबाड़ी जाते हैं और जिन्हें ठीक से चलना भी नहीं आता। ज़रा सी चूक या तेज बहाव के कारण किसी बड़े हादसे की आशंका बनी रहती है, फिर भी बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए परिवार रोजाना इस खतरे का सामना करने को विवश हैं।

पुल निर्माण की मांग और प्रशासनिक प्रक्रिया

ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि इस समस्या को लेकर कई बार प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष आवेदन दिए गए हैं और जनदर्शन में भी गुहार लगाई गई है। बरसात के दिनों में नाला उफान पर होने पर कई दिनों तक कक्षाएं प्रभावित रहती हैं और बच्चों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में खुले मंच पर पढ़ाने का प्रयास किया जाता है। हालांकि स्थानीय स्तर पर प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा जा चुका है और बजट में भी इसका जिक्र रहा है, लेकिन अभी तक अंतिम स्वीकृति का इंतजार किया जा रहा है।