जीवन में भक्ति का महत्व और उसे गोपनीय रखने की सलाह
पंडित विजयशंकर मेहता ने अपने कॉलम में जीवन के सुख और गुणों को सुरक्षित रखने के महत्वपूर्ण उपायों पर चर्चा की है। उन्होंने बताया कि किस प्रकार मानवीय गुण और सुख बिना भक्ति के वैसे ही व्यर्थ हो जाते हैं जैसे बिना नमक के विभिन्न प्रकार के व्यंजन।

भक्ति और गुणों का संबंध
तुलसीदास जी की एक पंक्ति का हवाला देते हुए बताया गया है कि जीवन के सभी सुख और सद्गुण भक्ति के बिना फीके पड़ जाते हैं। जिस तरह भोजन में नमक और शक्कर दिखाई नहीं देते लेकिन सारा स्वाद उन्हीं पर निर्भर करता है, उसी तरह हमारे जीवन के हर सुख और गुण का आधार भक्ति होनी चाहिए। यदि सुख और गुणों को भक्ति से न जोड़ा जाए तो उनका कोई सार्थक अर्थ नहीं रह जाता।
प्रदर्शन से बचना क्यों जरूरी है?
लेख में स्पष्ट किया गया है कि जब भक्ति में दिखावा या प्रदर्शन शामिल हो जाता है, तब वह केवल एक कर्मकांड बनकर रह जाती है। यह कर्मकांड धीरे-धीरे मात्र एक आदत का रूप ले लेता है। इसलिए यह आवश्यक है कि अपनी भक्ति को गोपनीय रखा जाए और उसका अत्यधिक प्रदर्शन करने से बचा जाए।

सच्ची भक्ति का असली स्वरूप
सच्ची भक्ति वही है जिसमें ईश्वर द्वारा दिए गए सुख और गुणों का एक निश्चित हिस्सा यानी दस प्रतिशत हिस्सा अन्य जरूरतमंद लोगों की भलाई के लिए उपयोग किया जाए। जब व्यक्ति अपने सुख और गुणों का एक अंश दूसरों की सहायता के लिए खर्च करता है, तभी जीवन के वास्तविक गुणों और सुखों का सही आनंद प्राप्त होता है।
