Search for:
  • Home/
  • देश/
  • सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश: जल निकायों और आर्द्रभूमियों की सुरक्षा के लिए राज्यों को मिला चार महीने का समय
सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश: जल निकायों और आर्द्रभूमियों की सुरक्षा के लिए राज्यों को मिला चार महीने का समय

सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश: जल निकायों और आर्द्रभूमियों की सुरक्षा के लिए राज्यों को मिला चार महीने का समय

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई में कहा है कि जल निकायों की सुरक्षा सुनिश्चित न होने की स्थिति में अदालतें मूकदर्शक बनी नहीं रह सकती हैं। शीर्ष अदालत ने देश के सभी राज्यों और संबंधित प्राधिकरणों को निर्देश दिया है कि वे आर्द्रभूमियों यानी वेटलैंड्स का भौतिक सत्यापन करें और उनकी सीमाओं का स्पष्ट निर्धारण करें।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश: जल निकायों और आर्द्रभूमियों की सुरक्षा के लिए राज्यों को मिला चार महीने का समय

जीवन के अधिकार से जुड़ा है जल संरक्षण

न्यायालय की पीठ ने सुनवाई के दौरान यह बात रेखांकित की कि जल निकाय आम जनता के लिए पीने के पानी के मुख्य स्रोत हैं। इनका संरक्षण सीधे तौर पर भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार से जुड़ा हुआ है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जल निकायों के असुरक्षित रहने से जो गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं, उनके प्रति न्यायपालिका उदासीन नहीं रह सकती।

राज्यों को दिया गया समय और हलफनामा निर्देश

अदालत ने निर्देश दिया है कि जिन क्षेत्रों में अभी तक भौतिक सत्यापन का काम पूरा नहीं हुआ है, वहां इस प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा किया जाए। इसके साथ ही संबंधित अधिकारियों को यह निर्देश भी दिए गए हैं कि वे अपनाई गई पूरी प्रक्रिया का ब्योरा देते हुए एक अनुपालन हलफनामा अदालत में दाखिल करें।

शुरुआत में न्यायालय इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए चार सप्ताह का समय देना चाहता था। हालांकि, वरिष्ठ अधिवक्ताओं की ओर से यह दलील दी गई कि इस बड़े काम में विभिन्न प्रशासनिक विभागों के बीच समन्वय और व्यापक कार्य की आवश्यकता होती है, जिसके चलते अधिक समय चाहिए। व्यावहारिक दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए पीठ ने इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के वास्ते चार महीने की अवधि तय कर दी है।

नौ वर्षों के विलंब पर जताई चिंता

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि नियमों के प्रकाशन के पूरे नौ साल बीत जाने के बाद भी जल निकायों का भौतिक सत्यापन और सीमांकन कार्य अधूरा पड़ा हुआ है। यह पूरा मामला पक्षी प्रेमियों, अधिवक्ताओं और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा दायर की गई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आया है।