छिपी भूख से निपटने के लिए बेहद खास है बायोफोर्टिफाइड बैंगनी आलू
पर्याप्त मात्रा में कैलोरी का सेवन करने के बाद भी कई आबादी में आवश्यक विटामिन और खनिजों की कमी बनी रहती है, जिसे छिपी भूख या हिडन हंगर कहा जाता है। इस बड़ी पोषण संबंधी चुनौती से निपटने के लिए पादप प्रजनन के माध्यम से जैव-संवर्धित या बायोफोर्टिफाइड फसलों को तैयार किया जा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित रंगीन आलू की किस्में इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं।

छिपी भूख और बायोफोर्टिफाइड फसलों का महत्व
पारंपरिक खाद्य सुदृढ़ीकरण के विपरीत, बायोफोर्टिफिकेशन में पौधों के प्रजनन द्वारा सीधे फसल के भीतर ही पोषण तत्वों को समाहित किया जाता है। यह खाद्य पदार्थों में पोषण गुणवत्ता सुधारने का एक किफायती और स्थायी माध्यम है। वैज्ञानिक अनुसंधानों के परिणामों से लाल, बैंगनी और नीले गूदे वाले आलू तैयार किए गए हैं, जिनमें प्राकृतिक पिगमेंट जैसे एंथोसायनिन और कैरोटीनॉयड पाए जाते हैं। ये रंगीन आलू आयरन, जिंक और विभिन्न एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं।
ICAR-CPRI द्वारा विकसित रंगीन आलू की किस्में
संस्थान ने पिछले कुछ वर्षों में विशेष आलू की कई प्रमुख किस्में पेश की हैं:

- कुफरी नीलकंठ: यह बैंगनी छिलके वाली पहली विशेष किस्म थी जिसे वर्ष 2018 में जारी किया गया था।
- कुफरी माणिक: वर्ष 2021 में आई इस किस्म के कंद गहरे लाल रंग के, गोल आकार और पीले गूदे वाले होते हैं।
- कुफरी जामुनिया: वर्ष 2024 में आधिकारिक तौर पर जारी इस किस्म में एस्कॉर्बिक एसिड यानी विटामिन सी, एंथोसायनिन और कैरोटीनॉयड की मात्रा काफी उच्च है।
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कुफरी जामुनिया की मुख्य विशेषताएं और पोषण मूल्य
कुफरी जामुनिया मध्यम अवधि में पकने वाली फसल है जिसके कंदों का छिलका और गूदा दोनों ही बैंगनी रंग के होते हैं। इसके पौधे प्रति हेक्टेयर लगभग 32 से 35 टन तक की उपज देने में सक्षम हैं। इसके गूदे में एंथोसायनिन और विटामिन सी प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है। पारंपरिक पीले आलू की तुलना में इसमें जिंक और आयरन की मात्रा भी काफी अधिक पाई जाती है, जो इसे स्वास्थ्य की दृष्टि से बेहद फायदेमंद बनाती है।
खान-पान और पाक उपयोग
अपने अनूठे बैंगनी रंग और भुरभुरी संरचना के कारण यह किस्म पारंपरिक व्यंजनों के साथ-साथ कई प्रकार के प्रसंस्कृत उत्पादों में भी नयापन लाती है। इसका उपयोग सब्जी, पराठा, रायता, हलवा, उपमा और डोसा जैसे खाद्य पदार्थों में आसानी से किया जा सकता है। इसके अलावा बेकरी उत्पादों और सूप के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है, जो भोजन के दृश्य आकर्षण को भी बढ़ाता है। उत्तर भारतीय मैदानी क्षेत्रों के विभिन्न राज्यों में इसकी खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां मौजूद हैं।
