Search for:
  • Home/
  • ओपिनियन/
  • मुस्लिम-नाटो गठजोड़ और पाकिस्तान की रणनीतिक सीमाएं
मुस्लिम-नाटो गठजोड़ और पाकिस्तान की रणनीतिक सीमाएं

मुस्लिम-नाटो गठजोड़ और पाकिस्तान की रणनीतिक सीमाएं

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने अपने मक्का गठजोड़ यानी कथित ‘मुस्लिम-नाटो’ को सक्रिय करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। जब यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब पर मिसाइलें दागी गई थीं, तब यह सवाल सामने आया था कि क्या पाकिस्तान अपने सहयोगी देश की सुरक्षा के लिए आगे आएगा। हालांकि, इस पर निर्णय लेने में काफी वक्त लगा और इसके पीछे कई महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक कारण भी मौजूद रहे हैं।

मुस्लिम-नाटो गठजोड़ और पाकिस्तान की रणनीतिक सीमाएं

सैन्य ताकत और जमीनी हकीकत

ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स में पाकिस्तान की स्थिति मजबूत है और उसके पास बड़ी संख्या में सक्रिय सैनिक, लड़ाकू विमान और परमाणु हथियार मौजूद हैं। इसके बावजूद, इन सैन्य संसाधनों का उपयोग करने की रणनीतिक गुंजाइश सीमित रही है। विश्लेषकों के अनुसार, इसके मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं, जिनमें राजनीति, प्राथमिकताएं और देश की वित्तीय स्थिति शामिल हैं।

राजनीतिक और कूटनीतिक उलझनें

पाकिस्तान ने खुद को ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ के तौर पर पेश करने की कोशिश की है। ईरान के साथ उसकी लंबी सीमा है और ऊर्जा आपूर्ति तथा सीमाई सुरक्षा जैसे मुद्दों के चलते इस्लामाबाद ईरान से सीधे टकराव से बचना चाहता है। इसके अलावा, पाकिस्तान की रणनीतिक प्राथमिकताएं पश्चिम एशिया के बजाय अपने घरेलू मोर्चों और पड़ोस पर अधिक केंद्रित हैं।

मुस्लिम-नाटो गठजोड़ और पाकिस्तान की रणनीतिक सीमाएं
  • अफगानिस्तान के साथ सीमा विवाद और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का खतरा।
  • पूर्वी सीमा पर सेना की भारी तैनाती और देश के भीतर आतंकवाद की समस्या।
  • बलूचिस्तान में उग्रवाद और पीओके में अशांति से जुड़ा आंतरिक दबाव।

आर्थिक चुनौतियां और वित्तीय संकट

किसी अन्य देश के संघर्ष में शामिल होना अत्यधिक खर्चीला होता है, और वर्तमान में पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था इस तरह का भारी आर्थिक बोझ उठाने की स्थिति में नहीं है। देश की आर्थिक वृद्धि दर सीमित है, महंगाई दर ऊंची बनी हुई है और विदेशी मुद्रा भंडार मुख्य रूप से विदेशी कर्ज पर निर्भर करता है। ऐसे हालातों में बाहरी सैन्य अभियानों का खर्च वहन करना बेहद कठिन है।

हालांकि पहले से ही कुछ पाकिस्तानी सैनिक और सैन्य उपकरण सऊदी अरब में तैनात हैं और उनका खर्च रियाद द्वारा उठाया जाता है, फिर भी समग्र रूप से टकराव से बचने की नीति अपनाई जा रही है। इन तमाम परिस्थितियों को देखते हुए यह सवाल बना हुआ है कि कागजों पर मजबूत दिखने वाला यह गठजोड़ वास्तविक धरातल पर कितना प्रभावी हो पाएगा।