शीर्ष शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या के मामले और उनका बढ़ता दबाव
देशभर के प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों में बीते कुछ वर्षों के दौरान छात्रों द्वारा आत्महत्या किए जाने की कई दुखद घटनाएं सामने आई हैं। हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे (IIT बॉम्बे) में एक बीटेक छात्र की मृत्यु के बाद परिसरों के अंदरूनी माहौल और छात्रों पर पड़ने वाले मानसिक दबाव को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। इस तरह की घटनाओं ने शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों की सुरक्षा और उनकी मानसिक स्थिति पर विचार करने के लिए मजबूर किया है।

आईआईटी बॉम्बे में साहिल वाकोडे का मामला
आईआईटी बॉम्बे में बीटेक के छात्र साहिल वाकोडे का शव उनके कमरे में मिला था, जिसके बाद संस्थान के मुख्य गेट पर विद्यार्थियों द्वारा बड़ा विरोध प्रदर्शन किया गया। मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस शिकायतों के अनुसार, मिड-सेमेस्टर परीक्षा के दौरान छात्र को मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हुए पकड़ा गया था। छात्र के पिता ने आरोप लगाया कि एक प्रोफेसर द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा था, जिसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। संस्थान की फैकल्टी ने स्पष्ट किया है कि परीक्षा में नकल का पता चलने के बाद केवल निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया जा रहा था और छात्र की काउंसलिंग भी की गई थी।
प्रमुख शिक्षण संस्थानों में पिछले कुछ वर्षों के मामले
शीर्ष संस्थानों में आत्महत्या के ये मामले नए नहीं हैं, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में कई घटनाएं दर्ज की गई हैं:

- रोहित वेमुला केस (2016): हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के इस मामले ने देशव्यापी विरोध प्रदर्शन को जन्म दिया था, जिसमें भेदभाव और मानसिक परेशानी के आरोप लगे थे।
- दर्शन सोलंकी केस (2023): आईआईटी बॉम्बे के केमिकल इंजीनियरिंग के छात्र दर्शन सोलंकी की मौत के मामले में परिवार ने जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया था, जिसकी जांच के बाद एक छात्र की गिरफ्तारी भी हुई थी।
- आईआईटी मद्रास (2023): संस्थान के एक पीएचडी छात्र ने मानसिक उत्पीड़न के आरोपों के बीच कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी, जिसके बाद आरोपी प्रोफेसर को निलंबित कर दिया गया था।
- आईआईटी दिल्ली: हॉस्टल में कमरा न मिलने और अपने सहपाठियों से अलग होने के कारण उपजे तनाव के चलते एक छात्र ने परिसर में यह कदम उठाया था।
इन तमाम मामलों की जांच और पुलिसिया कार्रवाई के अपने अलग पहलू रहे हैं, लेकिन इन घटनाओं ने शिक्षा जगत के भीतर छात्रों की काउंसलिंग, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और संस्थागत संवाद की आवश्यकता को अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है।
