आधुनिक समाज में अकेलापन और घटते ‘थर्ड स्पेस’ की समस्या
आधुनिक दौर में स्क्रीन के प्रति बढ़ती निर्भरता और बदलती जीवनशैली के कारण समाज में अकेलापन एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। हालात यह हैं कि लोगों को अब वयस्क जीवन में सच्चे और भरोसेमंद दोस्त तलाशने के लिए सार्वजनिक रूप से प्रयास करने पड़ रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि आज की व्यस्त दिनचर्या और तकनीक के अत्यधिक इस्तेमाल ने इंसानी रिश्तों की दूरियों को बढ़ा दिया है। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर फ्रेंडशिप रिसर्च से जुड़ीं जैमी क्रेम्स के अनुसार, कई लोग अपने अकेलेपन को खुलकर स्वीकार कर रहे हैं और गैर-रोमांटिक सामाजिक कनेक्शन की तलाश में जुटे हैं। इस तरह के प्रयास इस बात का संकेत हैं कि व्यक्ति अपनी जिंदगी में सुरक्षित और संतोषजनक संवाद चाहते हैं।
घटता ‘थर्ड स्पेस’ और सामाजिक मेलजोल में कमी
सामाजिक विश्लेषकों का कहना है कि घर और कार्यस्थल के अलावा जो तीसरा सामाजिक वातावरण होता है, जिसे ‘थर्ड स्पेस’ कहा जाता है, वह लगातार घट रहा है। अर्बन सोशियोलॉजिस्ट रे ओल्डेनबर्ग द्वारा दिए गए इस शब्द का अर्थ उस सार्वजनिक माहौल से है जहाँ लोग अनौपचारिक रूप से मिलते-जुलते हैं। इस स्थान के सिमट जाने से लोगों का रचनात्मक सामाजिक दायरा भीछोटा होता जा रहा है। इसके अलावा, वयस्क जीवन की जिम्मेदारियां और स्क्रीन पर बीतने वाला वक्त भी लोगों को एक-दूसरे से दूर कर रहा है।

ऑनलाइन माध्यमों से दोस्ती की तलाश
अकेलेपन से जूझ रहे लोग टिकटॉक और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म का सहारा लेकर अपनी जरूरतें खुलकर साझा कर रहे हैं। हालांकि ऑनलाइन बनने वाले हर रिश्ते या विज्ञापन के जरिए मिलने वाले रिस्पॉन्स हमेशा स्थायी दोस्ती में नहीं बदल पाते हैं, लेकिन यह समाज में बढ़ती उस आवश्यकता को जरूर दर्शाते हैं जो सार्थक संबंधों की मांग करती है। जानकारों का सुझाव है कि स्क्रीन-फोकस्ड जीवनशैली से बाहर निकलकर वास्तविक और बचपन के रिश्तों को सहेजना ही मानसिक संतुलन और सार्थक जीवन के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है।
