ट्रेन यात्रा में शांतिपूर्ण माहौल बनाए रखना क्यों है जरूरी, जानिए क्या हैं नए नियम
ट्रेनों में सफर करना कभी बेहद सुकून भरा और यादगर अनुभव हुआ करता था, जहां खिड़की से बाहर के नजारे देखते हुए यात्री अपना समय बिताते थे। लेकिन वर्तमान समय में एसी और वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेनों में यह शांत माहौल लगातार बाधित हो रहा है। मोबाइल फोन पर तेज आवाज में गाने बजाना, वीडियो देखना और लाउडस्पीकर पर बात करना आज आम बात बन गई है, जिससे यात्रियों की परेशानी बढ़ रही है।

बदलते सफर और शोर की समस्या
आधुनिक ट्रेन कोचों को इस तरह से डिजाइन किया जाता है कि बाहर की पटरियों की आवाज अंदर कम आए। ऐसे कोचों में जब कोई यात्री मोबाइल या सोशल मीडिया रील्स को तेज आवाज में चलाता है, तो वह ध्वनि बाकी लोगों को बहुत अधिक चुभती है। खासकर रात के समय जब यात्री आराम करने की कोशिश करते हैं, तब यह शोर और भी ज्यादा असहनीय हो जाता है। आने वाले वर्षों में शहरी आबादी और रेल यात्रियों की संख्या में भारी बढ़ोतरी की उम्मीद है, जिसके चलते ट्रेनों में शांति बनाए रखना और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
वैश्विक स्तर पर अपनाए जा रहे कड़े नियम
दुनियाभर के कई देशों में रेलवे नेटवर्क इस डिजिटल शोर से निपटने के लिए सख्त कदम उठा रहे हैं। अमेरिका और जर्मनी की ट्रेनों में विशेष ‘क्वाइट कोच’ होते हैं जहां कड़े नियम लागू हैं, जबकि जापान की बुलेट ट्रेनों में पूरी ट्रेन को शांत क्षेत्र माना जाता है। इसी वैश्विक तर्ज पर भारतीय रेलवे ने भी नियमों का पालन न करने वालों के खिलाफ कड़े प्रावधान तय किए हैं।

जुर्माने और कानूनी प्रावधान
जन विश्वास एक्ट के अंतर्गत यदि कोई यात्री सफर के दौरान स्पीकर पर गाने या वीडियो चलाता है, बच्चों को बिना ईयरफोन के कार्टून दिखाता है या रात में ऊंची आवाज में फोन पर बात करता है, तो उसे जुर्माना भरना पड़ सकता है। ऐसे मामलों में मौके पर ही 1000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है और यात्री को ट्रेन से भी उतारा जा सकता है। बार-बार नियमों की अनदेखी करने पर जुर्माना राशि 5000 रुपये तक हो सकती है और छह महीने तक की सजा का प्रावधान भी है। सफर को सभी के लिए सुखद बनाने के लिए यह जरूरी है कि यात्री अपनी जिम्मेदारी समझें और इयरफोन का उपयोग करें।
