उत्तर प्रदेश की सियासत में कांग्रेस की बदलती रणनीति, ब्राह्मण चेहरे पर दांव
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस पार्टी ने एक अहम बदलाव करते हुए अपनी चुनावी रणनीति को नया आकार देना शुरू कर दिया है। पार्टी ने एक ब्राह्मण महिला नेता आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है। इस साहसिक कदम के जरिए पार्टी का मुख्य उद्देश्य उस समुदाय को अपने पाले में लाना है, जो लंबे समय से भाजपा का मजबूत समर्थक माना जाता रहा है।

पुराने सामाजिक समीकरणों को पुनर्जीवित करने की कोशिश
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के सामने अपने अस्तित्व को बचाए रखने की चुनौती है। पिछले विधानसभा चुनावों में पार्टी का वोट शेयर बेहद कम रहा था। ऐसे में भाजपा के मजबूत गढ़ में सेंध लगाने की यह कोशिश राजनीतिक रूप से काफी अहम मानी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस एक बार फिर इंदिरा गांधी के दौर के ब्राह्मण-दलित-अल्पसंख्यक यानी बीडीए समीकरण को दोबारा खड़ा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। 1970 और 1980 के दशक तक इस सामाजिक गठजोड़ के सहारे पार्टी राज्य की सत्ता में मजबूत स्थिति में हुआ करती थी, लेकिन राम मंदिर आंदोलन के बाद ब्राह्मण मतदाता बड़े पैमाने पर भाजपा की तरफ चले गए थे।
नए पदाधिकारियों के चयन में दिखा संतुलन
कांग्रेस की नई टीम के गठन में सामाजिक संतुलन साधने की पूरी कोशिश दिखाई देती है। प्रदेश अध्यक्ष पद पर ब्राह्मण चेहरे के अलावा, कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में मुस्लिम समुदाय से आने वाले इमरान मसूद को जिम्मेदारी दी गई है। इसके साथ ही वरिष्ठ उपाध्यक्ष पदों पर दलित और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के नेताओं को शामिल किया गया है। इन नियुक्तियों में प्रियंका गांधी वाड्रा की पसंद और रणनीति की छाप साफ तौर पर नजर आ रही है।

सपा के साथ समन्वय और आगामी चुनाव
आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। दोनों दल मिलकर भाजपा के मजबूत सामाजिक ताने-बाने को चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। कांग्रेस का बीडीए समीकरण और समाजवादी पार्टी का पीडीए समीकरण आने वाले समय में राज्य के राजनीतिक समीकरणों को किस तरह प्रभावित करेगा, यह देखने वाली बात होगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश का यह राजनीतिक मुकाबला राष्ट्रीय स्तर पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
