Search for:
  • Home/
  • ओपिनियन/
  • डर और कर्तव्य के बीच असली परीक्षा: जब लोगों ने अपनी जान की परवाह किए बिना बचाई दूसरों की जिंदगी
डर और कर्तव्य के बीच असली परीक्षा: जब लोगों ने अपनी जान की परवाह किए बिना बचाई दूसरों की जिंदगी

डर और कर्तव्य के बीच असली परीक्षा: जब लोगों ने अपनी जान की परवाह किए बिना बचाई दूसरों की जिंदगी

जीवन में ऐसे कई कठिन मोड़ आते हैं जब डर इंसान पर पूरी तरह हावी हो जाता है और दिमाग सिर्फ अपनी जान बचाने के बारे में सोचने लगता है। हालांकि, कुछ असाधारण लोग ऐसे भी होते हैं जो भय के उन गंभीर पलों में भी अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा से ऊपर दूसरों के जीवन की रक्षा को चुनते हैं। ऐसे ही साहसिक फैसले हमारे असली चरित्र को सबके सामने लाते हैं और इतिहास में यादगार बन जाते हैं।

डर और कर्तव्य के बीच असली परीक्षा: जब लोगों ने अपनी जान की परवाह किए बिना बचाई दूसरों की जिंदगी

कॉकपिट में घायल पायलट का अदम्य साहस

हाल ही में फ्लाई दुबई के विमान में एक ऐसा ही वाकया सामने आया जब घायल भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मछार ने अपने घावों की परवाह किए बिना कॉकपिट का दरवाजा खोला। खुद की जान बचाने के बारे में सोचने के बजाय उन्होंने विमान में सवार सभी यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखा। उनके इस सूझबूझ भरे कदम की वजह से यात्रियों और अन्य सहयोगियों को अंदर आकर स्थिति को संभालने का मौका मिल सका।

इतिहास के पन्नों में दर्ज बहादुरी की मिसालें

दुनिया ने पहले भी कई बार ऐसे निस्वार्थ साहस को देखा है। कराची में विमान अपहरण के दौरान नीरजा भनोट ने अपनी जान जोखिम में डालकर यात्रियों की रक्षा की थी और आपातकालीन द्वार खोलकर कई लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला था। इसी तरह 26 नवंबर 2008 की रात मुंबई में एएसआई तुकाराम गोपाल ओंबले ने बिना किसी हथियार के ऑटोमैटिक राइफल को थाम लिया था, ताकि उनके साथी आतंकवादी को काबू में कर सकें।

डर और कर्तव्य के बीच असली परीक्षा: जब लोगों ने अपनी जान की परवाह किए बिना बचाई दूसरों की जिंदगी

कर्तव्य की सीमा से परे मानवता

आरपीएफ कांस्टेबल शिवचरण सिंह का उदाहरण भी कुछ ऐसा ही है, जिन्होंने साल 2019 में बाढ़ के पानी में उतरकर कई लोगों की जान बचाई थी, जबकि उनकी अपनी ड्यूटी केवल ट्रेन की सुरक्षा करना थी। इन सभी घटनाओं से यही संदेश मिलता है कि सच्चे नायक वे नहीं होते जिन्हें कभी डर नहीं लगता, बल्कि वे होते हैं जो डर को महसूस करने के बाद भी अपने कर्तव्य को निभाना नहीं छोड़ते।