अमेरिका के नए टैरिफ नियमों और रूसी तेल आयात पर क्या कहते हैं विदेश मामलों के जानकार
अमेरिका द्वारा रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने संबंधी ग्राहम बिल को कानूनी रूप दिए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और द्विपक्षीय संबंधों पर इसके असर को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। नए नियमों के तहत रूस से तेल आयात करने वाले या प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाए जाने का प्रावधान है। इस स्थिति ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक रणनीतिकारों के सामने नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

भारत की ऊर्जा जरूरतें और रूस पर निर्भरता
आधिकारिक बयानों के अनुसार भारत अपनी जनता की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से तेल की खरीद जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि, पिछले कुछ समय के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का एक बड़ा हिस्सा रूस से आयात करता रहा है। यूक्रेन संघर्ष के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों और वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच भारत ने रियाद और अन्य पारंपरिक विकल्पों के साथ-साथ रूसी तेल का रुख किया था।
ऐतिहासिक उदाहरण और अमेरिकी दबाव
विशेषज्ञों का मानना है कि अतीत में भी अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत को वेनेजुएला और ईरान जैसे देशों से तेल आयात शून्य करना पड़ा था। वर्ष 2016-17 में वेनेजुएला से होने वाला आयात और 2018 से पहले ईरान से मिलने वाली आपूर्ति कड़े प्रतिबंधों के चलते धीरे-धीरे बंद हो गई थी। अतीत के इन अनुभवों को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा रहा है कि अमेरिकी दबाव के आगे ऊर्जा नीतियों में संतुलन बिठाना आसान नहीं होगा।

चीन और भारत की स्थितियों में अंतर
इस पूरे घटनाक्रम में चीन और भारत की रणनीतिक स्थिति में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। बीजिंग के पास रेयर अर्थ, मैग्नेट और फार्मास्यूटिकल सामग्री के निर्यात जैसे मजबूत आर्थिक हथियार मौजूद हैं, जिनका उपयोग वह अमेरिकी दबाव का मुकाबला करने के लिए कर सकता है। इसके विपरीत, टैरिफ और व्यापारिक मसलों पर भारत के पास सीमित विकल्प ही बचे हैं, जिससे आने वाले समय में कूटनीतिक मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
