मतदाता सूची में फॉर्म-6 और एसआईआर प्रक्रिया पर विवाद, जानिए क्या है पूरा मामला
भारत का निर्वाचन इन दिनों एक बड़े राजनीतिक और आंतरिक संकट के दौर से गुजर रहा है। मतदाता सूचियों को अपडेट करने की प्रक्रिया और फॉर्म-6 के नए नियमों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त से लेकर आयोग की कार्यप्रणाली पर चारों तरफ से सवाल उठाए जा रहे हैं। विपक्षी दलों द्वारा लगाए जा रहे ‘वोट चोरी’ के आरोपों के बीच मीडिया रिपोर्ट्स में आयोग के भीतर चल रहे भारी मतभेदों और आंतरिक कलह की बात भी सामने आई है।

विवाद की जड़ और फॉर्म-6 में बदलाव
जून 2025 में चुनाव आयोग ने देश की मतदाता सूचियों में सुधार और उन्हें अपडेट करने के वास्ते ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ यानी एसआईआर प्रक्रिया की शुरुआत की थी। इस बड़े सुधार अभियान के बाद जब पहली ड्राफ्ट वोटर लिस्ट सामने आई, तो देश भर से तेरह करोड़ से अधिक नाम हटाए जा चुके थे। इसके बाद विपक्षी दलों ने यह आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से चुनाव आयोग ने मनमाने तरीके से मतदाताओं के नाम हटाए हैं।
इस पूरे विवाद के केंद्र में नया फॉर्म-6 है, जिसके जरिए अठारह साल से अधिक उम्र का कोई भी व्यक्ति मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन करता है। इस फॉर्म में एक नया अनिवार्य सवाल जोड़ दिया गया था कि क्या आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी इससे पहले की एसआईआर वोटर लिस्ट में मौजूद थे। इस पर यह आपत्ति जताई गई कि बिना सरकार के नियम बदले इस तरह का नया सवाल जोड़ना ठीक नहीं है, जिससे नए मतदाताओं को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

आयोग के भीतर आंतरिक मतभेद
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चुनाव आयोग के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले कुछ महीनों के दौरान एसआईआर प्रक्रिया से जुड़े कई फैसलों और आदेशों पर आधिकारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इन आयुक्तों का कहना था कि आयोग के कई प्रमुख निर्णय उनकी लिखित सलाह और सहमति के बिना लिए गए हैं। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन आंतरिक असहमतियों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि यह किसी भी बहु-सदस्यीय संस्था में प्रशासनिक चर्चा और फीडबैक का एक सामान्य हिस्सा है तथा सभी अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से ही लिए गए हैं।
विभिन्न राज्यों से जुड़ी तकनीकी समस्याएं
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान स्थानीय स्तर पर चुनावी अधिकारियों की पहुंच सीमित करने और सॉफ्टवेयर से जुड़ी तकनीकी खामियों के मामले भी सामने आए हैं। गोवा में चुनाव कार्यालय द्वारा कई बार पत्र लिखने के बावजूद सही दस्तावेजों वाले मतदाताओं को सॉफ्टवेयर में जोड़ने का तकनीकी विकल्प नहीं मिला, जिससे वे लोग अपने मताधिकार से वंचित रह गए। इसके अलावा पश्चिम बंगाल में भी डेटा से जुड़ी गड़बड़ियों और बड़ी संख्या में पेंडिंग अपीलों को लेकर सवाल खड़े हुए हैं, जिन पर अब अदालत और ट्रिब्यूनल स्तर पर विचार किया जा रहा है।
