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आर्थिक असमानता और जलवायु नीतियों के बीच बढ़ता टकराव

आर्थिक असमानता और जलवायु नीतियों के बीच बढ़ता टकराव

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बनाई जाने वाली नीतियों के केंद्र में इन दिनों एक बड़ा विरोधाभास देखा जा रहा है। दुनिया भर के नागरिक चाहते हैं कि सरकारें ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएं, लेकिन कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में मतदाता ऐसी राजनीतिक पार्टियों का समर्थन कर रहे हैं जो जलवायु संकट को नकारती हैं या उसकी गंभीरता को कम आंकती हैं। यह वैचारिक और राजनीतिक संकट समाज में फैली गहरी आर्थिक असमानता की देन है।

आर्थिक असमानता और जलवायु नीतियों के बीच बढ़ता टकराव

आर्थिक असुरक्षा और अविश्वास का संकट

एक तरफ जहां कुछ गिने-चुने लोग भारी संपत्ति के मालिक बन रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बड़ी आबादी को अपने परिवार की बुनियादी जरूरतें पूरी होने की चिंता सता रही है। निम्न-आय वाले देशों में आर्थिक असुरक्षा की यह स्थिति और भी अधिक गंभीर बनी हुई है। इसके पीछे पिछले कई दशकों के वे अधूरे वादे हैं, जिनके तहत यह उम्मीद जताई गई थी कि संपत्ति का लाभ समाज के सबसे निचले तबके तक पहुंचेगा। वित्तीय संकट और वैश्विक झटकों ने उस व्यवस्था की कमियों को उजागर कर दिया है जहां मुनाफे पर कुछ चुनिंदा लोगों का अधिकार होता है, जबकि उसका जोखिम पूरे समाज और खासतौर पर गरीबों को उठाना पड़ता है।

सर्वेक्षण में सामने आए अहम तथ्य

कई प्रमुख देशों में किए गए एक हालिया सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है कि अधिकांश लोग अपनी मौजूदा आर्थिक व्यवस्था से संतुष्ट नहीं हैं।

आर्थिक असमानता और जलवायु नीतियों के बीच बढ़ता टकराव
  • सर्वे में शामिल अधिकांश लोगों का मानना था कि उनके देश में आर्थिक असमानता बहुत अधिक है।
  • बड़ी संख्या में लोगों का यह भी कहना था कि वर्तमान आर्थिक ढांचा केवल अमीर और ताकतवर वर्ग को फायदा पहुंचाने के लिए तैयार किया गया है।
  • अधिकतर नागरिक इस व्यवस्था में बड़े पैमाने पर बदलाव की मांग कर रहे हैं।

जलवायु नीतियों के लिए शर्तें और सामाजिक विभाजन

नागरिकों का मानना है कि नियम और नीतियां ताकतवर लोगों द्वारा अपने ही हितों को साधने के लिए बनाई गई हैं। इसी वजह से पर्यावरण और जलवायु से जुड़े अभियानों को मिलने वाला जनसमर्थन भी अब शर्तों के साथ आ रहा है। यदि नीतियां केवल आम जनता पर बोझ बढ़ाती हैं और सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले रईसों को राहत देती हैं, तो उन्हें व्यापक राजनीतिक और सामाजिक समर्थन मिलना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, समाजों में बढ़ता आपसी तनाव और राजनीतिक दूरियां ऐसी सामूहिक योजनाओं को आगे बढ़ाने की राह में बड़ी बाधा बन रही हैं जिनका परिणाम मिलने में लंबा समय लगता है।